आओ, जलाएं दिए इस कविता के संग,
*फूंक मारकर हम दिए को बुझा सकते हैं,*
*पर अगरबत्ती को नहीं।*
शब्दों में छिपा है जीवन का राज़,
*क्योंकि जो महकता है उसे कौन बुझा सकता है,*
*और जो जलता है वह खुद बुझ जाता है।*
यह कविता है सच्चे जीवन की छाया,
आओ, मिलकर जीते हैं हर पल को खुशियों के साथ।”