“जंगल खो रहे हैं”
जंगल खो रहे हैं, धरती के आंसू,
वन्यजनों की दहाड़ में, सुना रहे हैं ध्वनि।
हरियाली की छाँव में, थे जीवन के राजा,
बदलते वातावरण में, है रोने का समय आया।
नदियों की कहानी, सिरहाने से सुनी,
कहती है जंगल की ज़बान, अब है हमारी राहों में रुकावट आई।
हमें समझना होगा, जंगलों का हमारा हिस्सा है,
संरक्षण के लिए आगे बढ़ना होगा, नहीं तो खो बैठेंगे हम सब कुछ।