Skip to content

“रुपये की गाथा: आर्थिक शक्ति का संग्राम”

रुपये की गाथा, युगों की शान,

संस्कृति की धारा, आर्थिक पहचान।

चमकता वो सिक्का, चांदी का भार,

शेरशाह ने लिखा इसका पहला विचार।

 

मुगलों ने देखा, इसके तेज का नज़ारा,

अकबर के राज में छाया इसका पिटारा।

ब्रिटिश आए, बदली इसकी सूरत,

पर रुपया बना रहा हर दिल की मूरत।

 

आजादी का सपना, जब हुआ साकार,

रुपये ने पहना आज़ादी का श्रृंगार।

नोटों पर छपी, अब राष्ट्र की झलक,

बनेगा ये साथी, हर मुश्किल में अडिग।

 

आज ये रुपया, विकास की बयार,

बढ़ा रहा देश का आर्थिक प्रचार।

दुनिया के नक्शे पर, इसकी पहचान,

रुपया है भारत की शान, अभिमान।

 

वो सिक्का जो था, अब नोटों में आया,

हर हाथ में इसका ही गौरव समाया।

रुपया नहीं बस धन का प्रतीक,

यह देश

की शक्ति, जन का संगीत।