यहाँ पर एक हिंदी कविता प्रस्तुत है जो सरकार के प्रति कटु और चातुकर व्यं
सुनो, ऐ सरकार, तेरे वादों की बात,
कब तक हम सहें, ये ढोंग और ये जात।
चमकते चेहरे, भरे हुए पेट,
पर जनता का जीवन, है जैसे भूत का सेट।
बढ़ती महंगाई, छिपे हैं जुगाड़,
तेरी नीतियों में, जनता का ही है अभाग।
तू कहती है विकास, क्या सच में है ये?
या है बस एक सपना, जो दिखा है तेरे गले में।
चातुकारों का दल, तेरा ही तो साथ,
सच्चाई की राह में, करते हैं बेमात।
तेरे वादों की मिठाई, मीठी पर कड़वी है,
कहां गया वो हक, जो सबको मिला था?
ये तो बस ढकोसला है, एक बड़ा मज़ाक,
जब देखेंगे हम, तेरे असली नकाब।
आवाज उठाएंगे, हम सब मिलकर एक दिन,
तेरे राजनैतिक खेल को, करेंगे बेनकाब बिन।